बुधवार, 3 अक्तूबर 2012

छपरवा के आदिवासी विद्यार्थियों की स्कूल को गोद लिया रोटरी क्लब ने



ट्वीस्ट 4 @दिनेश ठक्कर - छत्तीसगढ़ के अचानकमार प्रोजेक्ट टाइगर क्षेत्र के तहत आने वाले वन ग्राम छपरवा में गांधी जयन्ती के अवसर पर मंगलवार को रोटरी क्लब बिलासपुर ने आदिवासी विद्यार्थियों को निःशुल्क पाठ्य पुस्तकें वितरित की. रोटेरियन प्रोफ़ेसर डा. आरके सक्सेना ने विद्यार्थियों को शैक्षणिक मार्गदर्शन भी दिया. रोटरी क्लब बिलासपुर ने छपरवा की अभ्यारण्य शिक्षण समिति हायर सेकेंडरी स्कूल को गोद लिया है. इसके उन्नयन के लिए विभिन्न योजनाओं पर अमल करने का सिलसिला शुरू हो गया है. 
मंगलवार को बिलासपुर के रोटरी क्लब के अध्यक्ष देवाशीष घटक, सह सचिव गोपाल सिंहल, कोषाध्यक्ष सतीश शाह, वरिष्ठ रोटेरियन डीपी मारदा, राकेश खंडेलवाल श्रीमती रेणु घटक, श्रीमती मीता घटक, डा. शीला तिवारी और डा. आरके सक्सेना ने छपरवा में दस्तक देकर आदिवासी विद्यार्थियों को मदद करने की अनुकरणीय पहल की. सीएमडी कालेज बिलासपुर के वरिष्ठ प्रोफ़ेसर रोटेरियन डा. आरके सक्सेना ने विद्यार्थियों की क्लास लेकर शैक्षणिक मार्गदर्शन दिया. जबकि कन्या महाविद्यालय बिलासपुर की पूर्व प्राचार्य डा. शीला तिवारी ने व्यक्तित्व विकास की बारीकियां समझाईं. इस स्कूल के ग्यारहवीं और बारहवीं के विद्यार्थियों को विज्ञानं संकाय की किताबें निःशुल्क वितरित की गई. रोटरी क्लब ने इस सुविधाविहीन आदिवासी स्कूल को गोद लेकर एक अनूठी मिसाल पेश की है. इस सत्र में इसके उन्नयन की विभिन्न योजनायें बनाई गई हैं. विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास से लेकर स्वास्थ्य सुविधा देने समय समय पर शिविर लगाने का निर्णय लिया गया है. बिलासपुर में यहाँ के गरीब विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा की निःशुल्क कोचिंग देने का भी फैसला लिया गया है. 
 ज्ञात हो की छपरवा स्थित अभ्यारण्य शिक्षण समिति हायर सेकेंडरी स्कूल के बैगा आदिवासी सहित अन्य जाति के मेधावी विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति तथा बुनियादी सुविधाएं देने के लिए रोटरी क्लब द्वारा गत माह विवरण संग्रहित किया गया था. यहाँ के विद्यार्थियों को खेल सामग्री भी वितरित की गई थी.
रोटरी क्लब, बिलासपुर के अध्यक्ष देवाशीष घटक ने इस वर्ष मेधावी विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति देने के अलावा इस सुविधाविहीन स्कूल को समस्त शैक्षणिक साधन उपलब्ध कराने का भी फैसला लिया है. पिछले बिलासपुर प्रवास के दौरान रोटरी क्लब के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष कल्याण बनर्जी ने आदिवासी क्षेत्र में सेवा कार्य किये जाने की मंशा जाहिर की थी. उन्होंने बिलासपुर शाखा से ऐसे सेवा कार्यों की अपेक्षा भी की थी. छपरवा की इस स्कूल के मानसेवी प्राचार्य और समाजसेवी पी. डी. खैरा ने रोटरी क्लब की इस अनुकरणीय पहल पर आभार जताया है. गौरतलब है कि पी. डी. खैरा दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर रह चुके हैं. वे एक लम्बे अरसे से छपरवा लमनी क्षेत्र में रह कर वहां के आदिवासियों और उनके बच्चों के उत्थान जैसे सेवा कार्यों में निस्स्वार्थ भावना से जुटे हुए हैं.
छपरवा की अभ्यारण्य शिक्षण समिति हायर सेकेंडरी स्कूल में इस वक्त विभिन्न जाति के ५४ विद्यार्थी अध्ययनरत हैं. इनमें बैगा, कंवर, गोंड़, पनिका, रावत, कोल, लोहार, धोबी और मुस्लिम जाति के विद्यार्थी शामिल हैं. यहाँ अब केवल तीन बैगा आदिवासी विद्यार्थी मंगल सिंह, सुनीता और शामवती पढ़ रहे हैं. इसके पहले यहाँ के कुछ बैगा विद्यार्थी अच्छे  अंक प्राप्त कर उत्तीर्ण हुए थे. बारहवीं कक्षा के बाद अब वे उच्च शिक्षा की तरफ अग्रसर हुए हैं. वे प्रतियोगी परीक्षा में भी पास हुए हैं. गोंड़ आदिवासी विद्यार्थी काशीराम ने इस बार दसवीं की परीक्षा में ७० फीसदी अंक हासिल किये थे. छपरवा की इस स्कूल के विद्यार्थी गणित विषय के साथ अंग्रेजी में भी निपुण हो गए हैं. इस स्कूल का लोकार्पण २३ जून २००८ को हुआ था. वन ग्राम विकास अभिकरण योजना के तहत इसे वन विभाग द्वारा इस समय संचालित किया जा रहा है. 

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

दीदी ने छिनी यूपीए सरकार से "ममता"


ट्वीस्ट ३ @दिनेश ठक्कर -  पश्चिम बंगाल की खूंखार "दीदी" ने मंगलवार की शाम को यूपीए सरकार का साथ आख़िरकार छोड़ ही दिया. तीन घंटे चली अपनी पार्टी टीएमसी के १९ सांसद , छह मंत्रियों और पदाधिकारियों की मेराथन बैठक में ममता बनर्जी के तेवर को देखते हुए उनके लोगों को भी हाँ-हाँ मिलानी पड़ी. अपने मंत्री, सांसदों से अलग-अलग बात कर सुर में सुर मिलाने की नसीहत दी. फिर प्रेस वार्ता में अंततः दीदी ने अपने कड़े फैसले का एलान कर दिया. दीदी ने अपनी ममता यूपीए सरकार से छीन ली. अब वे सिर्फ मां, माटी, मानुष के साथ रहेंगी. शुक्रवार को जुम्मे की नमाज के बाद तीन बजे दिल्ली में उनके सभी छह मंत्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपना स्तीफा सौपेंगे. यानी सियासी नाटक का मंचन शुरू. हालांकि दीदी ने दो दिन का वक्त देकर सियासी सौदेबाजी का रास्ता खुला रखा है. "मान न मान मैं तेरा मेहमान" का मुगालता दीदी ने अभी भी पाल रखा है. 
जिस थाली में खाया, उसमें छेद कर दिया. जिस नाव की सवारी की उसमें ही छेद कर दिया. गठबंधन की कश्ती में सवार होकर सियासी समंदर की लहरों से पंगा क्यों ले लिया? क्या डूबते को तिनके का सहारा मिलेगा? दीदी ने आखिर ऐसा क्यों? यूपीए से नाता तोड़ने के तीखे सवाल सुनकर वे पत्रकारों पर बिफरी भी. फिर सोची समझी स्क्रिप्ट पढी. दीदी को अफ़सोस जाहिर करते हुए कहना पडा कि प्रधानमंत्री अपनी मनमर्जी चलाते हैं. उनकी बातें नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित होती रही है. विदेशी किराना, रसोई और डीजल में मूल्य वृद्धि के निर्णय को वापस लेने का दिया गया उनका अल्टीमेटम नकार दिया गया. दीदी का मानना है कि विदेशी किराना से देश में लाखों लोग बेरोजगार हो जायेंगे. गरीबों को रोटी मिलनी मुश्किल होगी. देश भर में महंगाई बढ़ेगी. दीदी का साफ तौर पर कहना है कि मनमोहन सरकार द्वारा कोयला आवंटन घोटाले से लोगों का ध्यान हटाने के लिए विदेशी किराना को अनुमति दी गई है. उनके शब्दों में "कोलगेट को सपोर्ट करने एफडीआई गेट लाया गया है". 
दरअसल, दीदी ममता बनर्जी ने अपनी दादागिरी दिखाने का मन राष्ट्रपति चुनाव के दौरान ही बना लिया था. लेकिन वामपंथियों की बंगालीवाद की क्षेत्रीय तुतारी के डर से दादा प्रणव मुखर्जी का समर्थन करना पडा. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री होने के नाते दीदी ने बंगाली दादा के विरोध करने का जोखिम नहीं उठाया. लेकिन उस वक्त की सियासी तपिश में भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपनी आलाकमान सोनिया गांधी की इच्छा के अनुरूप सौदेबाज लड़ाकू दीदी की ममता की छाँव से दूर होना चाहते थे. दीदी से पीछा छुड़ाने अब कहीं जाकर मनमोहन सिंह की आड़ में सोनिया गांधी सफल हुई हैं. दीदी के समर्थन वापसी की घोषणा से मनमोहन सरकार अब सुकून की साँस ले रही है. सोनिया गांधी को भरोसा है कि यूपीए सरकार को बचाने के अंक गणित के सवाल समाजवादी पार्टी अथवा बहुजन समाज पार्टी सुलझा देंगे. जबकि समाजवादी पार्टी सरकार के संकट मोचन की भूमिका अदा करने में बिदक जायेगी, क्योंकि वह  उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में मिली अप्रत्याशित कामयाबी को लोकसभा के मध्यावधि चुनाव में भी भुनाना चाहेगी. मायावती तो मजबूरी का दूसरा नाम है. इसलिए वह मुलायम की सख्ती को भांपने के बाद समर्थन की बाँहें पसार कर जरूर खड़ी रहेगी. फ़िलहाल दीदी की तरह बहन जी के विरोध का ड्रामा जारी रहेगा. बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने का सियासी हाल भाजपा का है. दीदी की ताजा दादागिरी को भाजपा भले ही गांधीगिरी बताये, किन्तु वह भी सांड को लाल कपड़ा दिखाना नहीं चाहेगी. सियासी फायदे के लिए भाजपा गधे को भी बाप बनाने में भरोसा रखेगी. भाजपा प्रवक्ता ने मौक़ा पाते ही यह ढींढोरा पीटना शुरू कर दिया है कि यूपीए सरकार की उल्टी गिनती अब प्रारम्भ हो गई है. दीदी को मश्का मारने यह भी कह रहे हैं कि जिसकी बैसाखी के सहारे यूपीए सरकार टिकी हुई थी, उसे ही ठुकरा दिया. चाराबाज लालू प्रसाद को भी मसखरी करने का बढ़िया मौका मिल गया है. उनका कॉमेडी सर्कस कुछ दिन तक चैनलों पर चलता रहेगा. टाइमपास मूंगफल्ली का स्लाट आखिर लालू के जिम्मे ही तो रहता है. बहराल, दीदी की सौदेबाज दादागिरी ने सभी सियासी दलों को दांव दिखाने का अवसर प्रदान कर दिया है. दो-तीन माह में इलेक्शन का मूड बनाने की कवायद शुरू हो गई है.        
                    
   

सोमवार, 17 सितंबर 2012

"दीदी" दिखायेगी दादागिरी


ट्वीस्ट 2
@दिनेश ठक्कर- खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और डीजल की मूल्य वृद्धि के राजनैतिक मुद्दे पर अब "दीदी" (ममता बनर्जी) अपनी ही यूपीए सरकार को दादागिरी दिखाने उतारू हो गई है। उनके नेतृत्व में  हुआ तृणमूल कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन इस बार गीदड़ भभकी साबित नहीं होगा। उनके दल के सभी पिट्ठू मंत्री इस्तीफ़ा देकर केंद्र सरकार की जड़ में मठा डालने की तैय्यारी कर चुके हैं। साम्प्रदायिक शक्तियों को पनपने न देने के नाम पर पहले मनमोहन सरकार को बाहर से समर्थन देने का नाटक खेला जाएगा फिर सियासी हालात देख कर "दीदी" सरकार को बाय-बाय कर तीसरे मोर्चे की कवायद में जुट जायेंगी, इसके आसार प्रबल हैं। कांग्रेस को लक्षमण रेखा पार न करने की चेतावनी देने वाली "दीदी" अब स्वयं गठबंधन की लक्षमण रेखा लाँघ चुकी है।            

रविवार, 16 सितंबर 2012

ओखली में सिर डाला

ट्वीस्ट 1                                                                  
@दिनेश ठक्कर. मनमोहन सरकार द्वारा किराना, विमानन, प्रसारण और ऊर्जा क्षेत्र  में विदेशी निवेश के लिए बाजार खोलने का लिया गया फैसला मध्यावधि चुनाव का कारण बन सकता है। यह जानते हुए भी कि इसका विरोध होगा, फिर भी ओखली में सिर डाला गया है। अब अपनों से ही लड़ते हुए यूपीए सरकार के जाने का वक्त करीब आ गया है। दादा, दीदी, भैय्या, चाचा, चाची को समर्थन वापस लेने का बहाना मिल गया है।